शुक्रवार, 26 मार्च 2010

सतेन्द्र दुबे केस का फैसला आज


सत्येन्द्र दुबे की शहादत को याद करने की जरुरत
आज सत्येन्द्र दुबे को याद करने की जरुरत है जिन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में निदेशक के पद पर कार्य करते हुए उस परियोजना में हो रहे भ्रस्टाचार के खिलाफ इस देश के प्रधानमंत्री को ख़त लिखा। प्रधानमंत्री कार्यालय से वो ख़त उन भ्रष्ट माफियाओं के हाथ पंहुचा, जिन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज में हो रहे भ्रष्टाचार का उजागर करने वाले सच के सिपाही सतेन्द्र दुबे की 27 नवम्बर 2003 को गोली मारकर हत्या कर दी. आजादी के बाद गाँधी जी के हत्या से शुरू हुई सच के हत्याओं का सिलसिला शंकर गुहा नियोगी. अवतार सिंह पाश, सफ़दर हासमी, रहमत वसाले, सरिता, महेश, मजुनाथान ललित नारायण और सतीश सेठी जैसे लोगो को शहादतो के बाद भी जारी है. सत्य की रक्षा और भ्रस्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले इन लोगो की हत्याओं में सरकार किन्ही न किन्ही रूप में हमेशा शामिल रही है. साथ ही हम समाज के लोग जो इन हत्यों के बाद ख़ामोशी ओढ़ लेते है उतने ही जिम्मेदार है. हत्यारे आज भी बेख़ौफ़ हमारे बीच फिर से किसी और सच की हत्या के लिए घूम रहे है. न्यायपालिका की फैसले की लम्बी प्रक्रियाओं के बाद भी दोषियों को सजा न मिल पाना, भ्रष्टाचारियों और अपराधियों के हौसले को और बुलंद कर रही है. आज जरुरत है हम समाज के लोगो को आगे आने की इन दोषियों के खिलाफ खड़ा होने की ताकि फिर से किसी सत्य के सिपाही सतेन्द्र दुबे की हत्या न हो सके. आज 7 साल के बाद सत्येन्द्र दुबे केस का फैसला आ रहा है उम्मीद है की न्याय पालिका उन हत्यारों और उस साजिश में शामिल लोगो को सजा देकर आम आदमी का लोकतंत्र और न्यायपालिका में विश्वाश को मज़बूत करेगी। आज की और आगे आने वाली युवा पीढ़ी के लिए सतेन्द्र दुबे हमेशा आदर्श और प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे।
महेश

1 टिप्पणी:

  1. निर्णयों में देरी के लिए प्रक्रिया से अधिक न्यायालयों की कमी जिम्मेदार है। सरकारें इस कमी को पूरा करना भी नहीं चाहतीं।

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