मंगलवार, 7 सितंबर 2010

सूचना के शहीद सिपाही अमित जाठवा और रामदास पाटिल को कानपूर ने दी सच्ची श्रद्धांजलि .........

RTI कार्यकर्ताओं की शहादत को श्रधांजलि
देश भर में लगातार RTI कार्यकर्ताओं की हत्या उत्पीड़न के मामलों में खासी वृद्धि हुई है। एक तरफ जहां सरकार सूचना अधिकार अधिनियम को फैलाने और विभागों में पारदर्शिता लाने की नसीहत दे रही है। वही दूसरी आम जनता को किसी भी मामलें में सूचना देकर उसका उत्पीड़न किया जा रहा है। बीते कुछ महीनों में RTI कार्यकर्ताओं की ताबड़तोड़ हुई
हत्याओं से देश भर के सामाजिक संगठनों में रोष व्याप्त हैं। गौरतलब है कि अहमदाबाद के RTI कार्यकर्ता ने गिरी के जंगलो में हो रही अवैध खनन के खिलाफ RTI का इस्तेमाल कर एक जन आंदोलन खड़ा किया। जो खनन माफियाओं को नागवार गुजरा और 20 जुलाई 2010 को इस RTI कार्यकर्ता अमित जाठवा की अहमदाबाद हाई कोर्ट के सामने गोली मारकर हत्या कर दी गई। वहीं मराठवाड़ा में काम कर रहे RTI कार्यकर्ता रामदास पाटिल जो वहां पर अवैध बालू खनन और PDF प्रणाली में हो रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ RTI का इस्तेमाल कर एक जन संघर्ष चला रहे थे, उनकी भी हाल ही में 27 अगस्त 2010 को मुम्बई में हत्या कर दी गई। दिन पर दिन सूचना मांगने पर मिलती मौत साथ ही उत्पीड़न के खिलाफ और RTI कार्यकर्ताआ की शहादत को याद करते हुए आज 6 सितम्बर 2010 को शाम 5 बजे गांधी प्रतिमा फूलबाग में श्रद्धांजलि अर्पित की गई।आज की शहादत श्रद्धांजलि सभा की शुरुआत 2 मिनट का मौन रखकर शुरू की गयी। इसके बाद अपना घर के बच्चों ने गायेगा गायेगा जमाना गायेगा गीत गाकर गोष्ठी की शुरुआत की गोष्ठी के दौरान सरकार और जन प्रतिनिधियों से ये अपील की गई कि हत्यारोपियों को कठोर से कठोर सजा दिया जाय और देशहित में जान गंवाने वाले इन शहीद RTI कार्यकर्ताओं के परिवार को उचित मुआवजा दिया जाय। साथ ही ये भी मांग की गई कि RTI कार्यकर्ताओं की हत्या और उत्पीड़न रोकने के लिए सरकार कोई गम्भीर कदम उठाये जिससे सूचना
अधिकार अधिनियम का इस्तेमाल आम आदमी बेखौफ होकर कर सके। सभा में कुलदीप सक्सेना ने कहा कि RTI कार्यकर्ताओं की हत्या सिर्फ व्यक्ति की हत्या नही बल्कि ये लोकतन्त्र की हत्या है और हम सभी इसका पुरजोर विरोध करते है। दीपक मालवीय जी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि RTI कार्यकर्ताओं की शहादत की सच्ची श्रद्धांजलि सही अर्थो में तभी होगी जब इस देश का हर व्यक्ति RTI का इस्तेमाल करेगा। विजय चावला जी ने कहा कि ये एक लोकतन्त्र पर बड़ा हमला है। हमें इन साजिशों के अन्य तथ्यों को भी समझना पड़ेगा तभी हम इन ताकतों के खिलाफ सही तरीके से
लड़ सकेंगे आर0 टी0 आई0 कार्यकर्ता नरेश ने कहा कि अमित जाठवा और रामदास पाटिल की शहादत को हम बेकार नहीं जाने देंगे। इनकी खून की एक एक बूंद भ्रष्टाचार की ताबतू मेंअंतिम कील साबित होगी।
प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक और लेखक डॉ0 गिरीराज किशोर जी द्वरा मोमबत्ती जलाकर शहीद हुए RTI कार्यकर्ताओं को सच्चें अर्थो में श्रधांजलि अर्पित की गई। मोम्बत्ती जलाने के कार्यक्रम के दौरान जगदम्बा भाई ने गांधी ka priya
भजन रघुपति राघव राजाराम गाया। महामहिम राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन भी स्थानीय प्रशासन के माध्यम से भेजा गया।
आज के इस श्रधांजलि भा में मुख्य रूप से डा0 गिरीराज किशोर, कुलदीप सक्सेना, विजय चावला, विष्णु शुक्लशंकर सिंह, नीरजा, डा0 0 सिद्दकी, इस्लाम आजाद, विष्णु अग्रवाल, नरेश, दीनदयाल, आदि ने शिरकत की। आज के श्रधांजलि कार्यक्रम में सचूना का अधिकार अभियान 0प्र0, जन चेतना कला मचं , लोक सेवक मडंल, जन सचूना जाग्रति मिशन, सचूना जनहिताय जागरूकता , सोवियर, एन0 0 पी0 एम, आशा, श्रामिक भारती, चित्रगुप्त सभा और अन्य मजदूर सगंठन तथा जनसगंठनों ने प्रमुख रूप से भागीदारी की

Mahesh

RTICUP Kanpur

10/425, Harihar Nath Shastri

Bhavan, Khalasi Line, kanpur

M0. +91-9838546900



गुरुवार, 6 मई 2010

मान्यवर कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना के तहत आवास के नाम पर धोखा

भूखे मरने से बेहतर है अपने हको के लिए लड़ कर मरना ......

(लखनऊ में सरकार द्वारा उजाड़ी गई बस्ती के लोगो को मान्यवर कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना के तहत आवास दिए जाने के नाम पर
उ०प्र० सरकार ने बस्ती के लोगो को धोखा दिया)

हमेशा से सरकार के झूठे आश्वासन पर जनता विश्वास करती चली आई है | लेकिन अब जनता को भी सब मालूम हो चुका है कि सरकार की नीति ही बुरी है | जो हमेशा झूठे आश्वासन के अलावा और कुछ भी गरीब जनता को नहीं दे सकती है | इसी झूठे आश्वासन के कारण ही आज शहर की आम जनता खुले आसमान के नीचे रह रही है | इस जनता को सभी मौलिक अधिकारों से वंचित रहना पड़ रहा है | झूठे आश्वासन दे-दे के इनको हमेशा से अँधेरे में रखा जा रहा है | जिसका जीता जागता उदाहरण है- शहीद स्मारक पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे ग़रीब बस्तियों के वो तमाम महिला-पुरुष | जो रोज कमाते हैं और रोज खाते हैं | जिस दिन ये लोग मजदूरी नहीं करेन्गे शायद उस दिन इनके परिवार को खाना भी नसीब नहीं होगा | लेकिन सरकार को इन लोगों की कोई परवाह नहीं है हाल में ही इन लोगों को आश्वासन दिया गया था कि आप लोग मान्यवर कांशीराम शहरी गरी आवा योजना मेंफार्म भर दीजिये | जिसमे आपको निःशुल्क मकान दिये जायेंगे | गरीब जनता को क्या पता था कि यह हमारे साथ धोखा किया जा रहा है | भोली भाली जनता ने फिर एक बार इनके झूठे आश्वासन पर विश्वास कर लिया औरकाम-काज छोड़ कर सिर के ऊपर छत पाने का सपना देखने लगी | फार्म भरे गए | सरकारी कर्मचारियों द्वारा इनलोगों का सत्यापन भी किया गया | यह सत्यापन झूठी मानसिकता रखने वाले बड़े-बड़े अफसरों के इशारे पर किया गया था जो यह मान रहे थे कि शहर की इन बस्तियों में रहने वाले लोग बंगलादेशी हैं | सत्यापन में खुलासा भी हो गया कि ये लोग उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के रहने वाले गरीब मजदूर हैं जो रोजी रोटी की तलाश में शहरकी तरफ अपना मुख किया है | जाँच होने के बाद ये लोग निश्चिन्त हो गए कि चलो जो फार्म भरे गए थे उनकासत्यापन हो गया है | तो शायद अब मकान मिल ही जायेगा | लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था | पूरे डेड़ सालगुजर गया | लेकिन अभी तक इन्हें मकान और अन्य अधिकार नहीं मिले | अपने अधिकारों से वंचित औरसरकार की नीतियों से परेशान होकर आखिर इन लोगों ने धरने का रुख अख्तियार कर लिया |
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सरकार तेरी नीति बुरी है, झूठे आशवासन पर जनता मरी है....

शहरी गरीब आवास हमारे लिए नहीं तो, किसके लिएआदि नारों से धरने की शुरुआत मई २०१० से शहीद स्मारक, लखनऊ से हुयी | दिन रात इन लोगों का धरनाजारी है | अपने काम काज छोड़ कर यह लोग धरना दे रहे हैं | इस बार इन लोगों ने प्रण किया है कि हम लोग कोईभी ज्ञापन जैसी चीज नहीं देंगे और ही किसी के झूठे आश्वासन पर अपना धरना समाप्त करेंगे | हमारा धरना समाप्त होगा तो अपना घर लेकर ही | रात- दिन धरने पर ये लोग बैठे हैं और सामाजिक कार्यकर्ताओं और लोगों कीमदद से इनका पेट भर रहा है | प्रशासन की उदासीनता को देखिये कि जहाँ पर ये लोग धरना दे रहे हैं और शहीदोंकी स्थली शहीद स्मारक पर वैसे भले ही दिन रात बत्तियां जलती हों लेकिन जबसे इन गरीब लोगों ने अपना धरनाशुरू किया है | प्रशासन ने यहाँ की बत्तियां ही बुझा दी हैं | ताकि इन लोगों के साथ कोई भी रात में हमला कर दे, अँधेरा होने से हे लोग अपने घरों में चले जायेंगे | लेकिन प्रशासन शायद ये भूल चुका है कि जिसका घर ही नहीं है वो कहाँ जायेगा और जिसने कभी बिजली-बत्ती का मुख देखा ही नहीं है उनके लिए यह अँधेरा क्या चीज है | लेकिन हमारे प्रशासन और सरकार की मानवता यहीं से साफ़ नजर आती है कि वो कितना मानवीय और संवेदनशील है |

धरने के पहले दिन तो कोई झाकने नहीं आया कि आखिर इन लोगों को क्या तकलीफ है कि यहाँ जमावड़ा लगा के बैठे हैं | दूसरे दिन कुछ सरकारी नौकर आये भी तो, सब के सब नंगे | कोई कह रहा है कि हम ट्रांस गोमती .डी.एम. है, तो कोई कह रहा है कि हम सिटी मजिस्ट्रेट हैं | जब पूंछा गया कि हाँ भाई बताएं कि आप लोग क्यालाये है तो पता चला कि वो नंगे होकर आये है उनके पास केवल वही झूठे आश्वासन है | जिसके कारण आज तक इस भोली-भाली जनता को बहकाते चले आये हैं | वह इस बार भी यही सोंच रहे थे कि चलो हम फिर इस जनता से झूठ बोलेंगे और यह अपना धरना तोड़ देंगे, लेकिन यह शायद उनकी भूल थी | धरना बिलकुल डग-मगाया तक नहीं | इन लोगों के झूठे आशवासन पर धरना प्रदर्शनकारियों का हौसला और भी मजबूत हो गया और उनके इरादे भूख हड़ताल के लिए मजबूत हो रहे हैं | क्यों कि अब इन लोगों ने ठान लिया है कि भूखे, नंगे, बीमार, प्रताड़ित होकर मरने से कहीं अच्छा है कि शहीदों की तरह अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ते मरना कहीं अच्छा है |

लेखक: चुन्नीलाल
(सामाजिक कार्यकर्ता, आशा परिवार)

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

मजदूरो की हुई जीत

मजदूरो के आन्दोलन के दबाव में झुका आई० आई० टी कानपूर
आई० आई० टी कानपूर के विसिटर होस्टल से निकले गए १६ कर्मचारियों को विरोध में खड़े हुए हमारा मंच और अन्य आई० आई० टी कर्मचारियों के आन्दोलन करने की घोषणा के बाद दबाव में आये आई० आई० टी प्रसाशन और ठेकेदारों ने उन्हें फिर से काम पर वापस ले लिया.
आई आई टी कानपुर, जिसका नाम सुनते ही लोग क्या क्या सोचने लगते है, की वह कितनी अच्छी और खुबसूरतजगह है, और देश को कितना कुछ दे रही है, आई आई टी कानपुर। पर कभी भी वहाँ पर काम करने वाले डेली वोर्केर या ठेका मजदूर या कामगारों की के बारे में कोई सोचना भी नहीं चाहता। सोचने वाली बात है की जो आईआई टी देश के विकास के लिए कितना कुछ कर रही है (आई आई टी के अनुसार / अखबार के अनुसार) वो अपनेवहाँ काम करने वाले इन कामगारों के विकास के लिए करने की बात तो दूर, बात भी करना नहीं चाहती।

आई आई टी कानपुर के विसिटर होस्टल में ३१ मार्च २०१० को ठेका बदलने पर वहाँ पर काम करने वाले १६ लोगोको काम पर से हटा दिया गया और उनकी जगह नये लोगों को रख लिया गया। सोचने वाली बात यह है की जबलोग रखने ही थे तो लोगो को काम पर से हटाया ही क्यों गया। इसका एक सीधा सी कारन जो निकल कर आया वोये था की वहाँ पर पर काम कर रहे कुछ अधिकारियों के लोगों (जो या तो उनके रिश्तेदार थे, या उनकी जय जयकारकरने वाले थे) को काम पर रखना था। अब ये सोचने वाली बात है की जो आदमी पिछले कई सालो से वहाँ पर कामकर रहा था उसको तुम ने कितनी आसानी से कह दिया की अब आपको आने की जरुरत नहीं है, और आपका कामख़त्म किया जाता है। किसी ने ये नहीं सोचा की वो कल से क्या नया करने लगेगा या कल से उसके घर में कैसेकाम होगा, कल को उसका बच्चा उससे पूछे की "पापा आप काम पर क्यों नहीं जा रहे है" तो वो क्या जवाब देंगे, किसी ने सोचने की जरुरत भी नहीं सोची।

लेकिन जो साथी काम पर से हटाये गए थे उन्होंने ने इस बात को सोचा और कहा की हम हार नहीं मानेगे, और सभीसाथियों ने मिल कर इस पर बात की और ये निर्णय लिया की कुछ भी हो हम काम वापस लेकर रहेंगे। इन
साथियों ने "हमारा मंच" के साथ बैठक की और आगे के लिए कुछ निर्णय लिया आई आई टी प्रशासन पर दबाव बना औरप्रशासन ने अपना यही पुराना तरीका अपनाया की १६ में से १० लोगों को वापस काम पर रख लिया गया, और सोचाहोगा की अब हम किसी को नहीं रखेगे और इनकी लड़ाई भी कमज़ोर हो जाएगी। पर ये बड़ी अच्छी बात है की जिनसाथियों को वापस काम मिल गया था उन्होंने बाकी साथियों कहा साथ नहीं छोड़ा और जो प्रशासन की सोच थीउसको सफल नहीं होने दिया और सारे साथियों ने मिलकर बात की और कुछ संगठनों से बात कर सहयोग माँगा, जिसमे कर्मचारी संगठन, आई आई टी कानपुर ने इनका पूरा साथ दिया और इनकी लड़ाई में पूरा योगदान दिया।प्रशासन के उपर काफी दबाव बनाने के बाद प्रशासन को मज़बूरी में इनको काम पर वापस रखना पड़ा।

ये पहिली बार नहीं हुआ है की आई आई की कानपुर के अंदर लोगों को काम पर से हटाया गया हो, लेकिन साथियोंअब ये सोचना पड़ेगा की कब तक ये लोगों को काम पर से हटायेंगे और फिर कुछ प्रशासन पर दबाव बनाकर उनकोकाम वापस मिलेगा। अब सभी साथियों को एक होकर कुछ ठोस कदम लेना होगा, आखिर कब तक आई आई टीप्रशासन अपनी मर्जी से काम करेगा, आखिर ये सरकारी संस्थान है इसके कुछ कायदे - कानून है, इन कायदेकानून को ये अपनी मर्जी से तो मानने वाले नहीं है, तो हम सभी साथियों लोगों को एक होना होगा और एकसंगठित ताकत बनानी होगी, जिसका डर आई आई टी कानपुर प्रशासन की नीद उड़ा दे, और हम लोगों अपने घरमें चैन की नीद सोये।

मजदूर है , मजबूर नहीं....
हम अपना हक लेकर रहेंगे...

दीन दयाल सिंह
हमारा मंच

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

रविवार, 18 अप्रैल 2010

भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ २०१० - अमन के बढ़ते क़दम

२००५ में दिल्ली से मुल्तान तक पदयात्रा के बाद अब समय गया है कि शांति कारवाँ को पुन: कायम कियाजाए. इस भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ का कार्यक्रम अभी तयनहीं हुआ है, और इस बात पर संवाद जारी है, और संभवत: ये कारवाँ२०१० जुलाई महीने के आखरी सप्ताह से ले कर २०१० अगस्त महीनेके प्रथम भाग तक आयोजित हो सकता है.

इस भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ के लिए संस्थानिक अनुमोदन आमंत्रित हैं.

जो लोग इस भारत पाकिस्तान शांति कारवाँ में भाग में हिस्सा लेना चाहें, कृपया कर के अपने पासपोर्ट विवरणऔर अन्य आवश्यक जानकारी सईदा दीप, पाकिस्तान (saeedadiep@yahoo.com) और राजेश्वर ओझा, भारतको भेजें:
(rajeshwar.ojha@gmail.com)


नाम (जैसा कि पासपोर्ट में है):
पिता का नाम:
पासपोर्ट नंबर:
राष्ट्रीयता:
जन्म-तिथि:
पासपोर्ट किस जगह से जारी हुआ:
पासपोर्ट जारी करना की तारीख:
पासपोर्ट की समापन अवधि:

जो लोग भारत एवं पाकिस्तान के अलावा अन्य देशों के नागरिक हों, उनका भी इस कारवाँ में हिस्सा लेने के लिएस्वागत है. अधिक जानकारी के लिए कृपया करके -ग्रुप के सदस्य बने. सदस्य बनने के लिए, -मेल भेजिए: indopakpeacecaravan-subscribe@yahoogroups.com or send email to: bobbyramakant@yahoo.com

डॉ संदीप पाण्डेय
(समन्वयक: जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय)

भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ

भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ - अमन के बढ़ते क़दम
शायद ऐसा दुनिया में कहीं भी नहीं होगा जैसा कि भारत एवं पाकिस्तान में है कि लोग भावनात्मक रूप से इतनेघनिष्ठता से जुड़े हु हैं. परन्तु उनपर भी दुश्मनी औरवैमनस्य का जहर उडेला जा रहा है. इतिहास का यह एक क्रूरमोड़ था जब राजनीतिक बंटवारा हुआ जिस की वजह सेखून-खराबा हुआ और असंख्य लोगों की जानें गयीं. इन हादसोंने गहरे घाव दिए हैं और दोनों देशों के चैतन्य में ये जख्म अभीभी हरे हैं.
बंटवारे के बाद भारत पाकिस्तान के अशांत इतिहास में चारयुद्ध हुए और अनगिनत मासूमों की जानें गयीं. भारत-पाकिस्तान संबंधों में कश्मीर आज भी एक नाजुक रग़ बना हुआ है और दोनों देशों को स्व: विनाश की ओरले जाने के खतरे का कारण भी बना हुआ है. दक्षिण एशिया में जो कठ्ठार्पंथी वर्ग हैं वो ये सुनिश्चित करते हैं किनफरत और वैरभाव की आग धधकती रहे और दोनों ओर जान-माल का भरी नुक्सान होता रहे.

दोनों ओर के आम लोग, जो हिंसा और वैरभाव के शिकार होते हैं, अमन, चैन और शांति चाहते हैं - उनका मत हैकि दोनों ओर मैत्री और सामान्य संबंधों का माहौल बने. दोनों देशों के जो कुलीन शासक वर्ग है वो एक दुसरे के प्रतिशंका रखता है परन्तु जब भी भारत पाकिस्तान के लोग आपस में मिलते हैं, तो ये सब दुर्भावनाएं विलिप्त हो जातीहैं और मुहब्बत, आपसी लगाव और सद्भावना उमड़ती है - बिलकुल उसी तरह जिस तरह एक परिवार के लोगबरसों बिछड़ने के बाद आपस में मिल रहे हों. ऐतिहासिक कारणों की वजह से जो भूगोलिक सरहदें हमपर थोपीगयी हैं, दोनों देशों में लोगों के एक जैसे ही रीति-रिवाज़ और परम्पराएँ हैं, हमारी भाषा, संगीत, खान-पान, औरजीवनशैली तक एक जैसी ही है - जिसके कारण नि:संदेह हो कर ये कहा जा सकता है कि दोनों ओर लोगों के मूल्यऔर चिंतन एक सा ही है. लोगों को सरहदों ने बांटा तो है, पर उनके दिल एक ही हैं.

हम लोगों का मानना है कि यदि दोनों देशों के मध्य सही अर्थों में शांति और दोस्ती कायम करनी है तो पहल लोगोंको ही करनी होगी. अनेकों ऐसे प्रयास पिछले बरसों में हुए हैं जिनमें से भारत-पाकिस्तान (दिल्ली से मुल्तान तक) पदयात्रा २००५ एक है. सूफी संतों और कवियों ने प्रेम गीत गए थे जो आज भी दोनों देशों के लोगों के लिए भीप्रासंगिक हैं. इसी आपसी लगन और बंधुत्व के तारतम्य को मद्देनज़र रखते हुए २००५ दिल्ली-से-मुल्तान तक कीपदयात्रा दिल्ली-स्थित सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से आरंभ हुई और मुल्तान-स्थित संतबहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह पर समाप्त हुई थी. इस पदयात्रा ने दोनों देशों के शहरों, गाँव आदि से निकलते हुएप्रेम, शांति और बंधुत्व का सन्देश दिया. इसी के उपरांत अगस्त २००५ में दिल्ली में प्रथम परमाणु-रहित, वीसा-रहित दक्षिण एशिया सम्मलेन हुआ और दूसरा परमाणु-रहित, वीसा-रहित दक्षिण एशिया सम्मलेन २००७में लाहोर में संपन्न हुआ. इस सम्मलेन को वार्षिक करना के प्रयासों को अनेकों अडचनों ने खंडित किया है, जिनमेंसे सबसे बड़ी चुनौती है दोनों देशों में व्याप्त वीसा प्रणाली.

जमीनी स्तर पर अनेकों ऐसी पहलों का होना अनिवार्य है जिससे कि दोनों देशों की सरकारों की सोच बदले. जोसमस्याएँ दोनों देशों के लोग झेल रहे हैं वो सामान्य हैं - जैसे कि - गरीबी, बेरोज़गारी, वैश्वीकरण और आर्थिकउदारीकरण की नीतियों की मार, स्वास्थ्य एवं शिक्षा से जुड़े हुए संगीन मुद्दे, आदि.

दोनों देशों के बीच व्यापार और वाणिज्य के लिए रुकावटों को क्रमिक रूप से ढीला करना और अंतत: हटाना, आमलोगों का सरहद पार आने-जाने में बढ़ोतरी करना, आदि जैसे कदम नि:संदेह शांति प्रक्रिया को तेज़ी से आगेबढ़ाएंगे. आर्थिक रूप से मजबूत भारत एवं पाकिस्तान ही संपूर्ण दक्षिण एशिया के लिये शांति और समृद्धि का युगला सकता है. लेन-देन एवं आपसी सहयोग से, कट्टर राष्ट्रवाद के बजाय दोस्ती एवं शांति के माहौल से, ही दोनोंदेश विकास एवं उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होंगे.

बीते हुए दो सालों में दोनों सरकारों ने शान्ति की ओर कदम बढ़ाए हैं, परन्तु ये प्रयास शिथिल, धीमे, रुक-रुक केहुए हैं. दोनों देश की सरकारों को आम शांति-प्रिय लोगों की आवाज़ को सुनाने के लिए ही हम सब एक और पहलकरना के लिए प्रोत्साहित हुए हैं - "भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ - अमन के बढ़ते क़दम" - जो मुंबई से कराचीतक आयोजित किया जायेगा. इस शांति कारवाँ के जरिये, दोनों देशों के आम लोगों को अपनी शांति एवं दोस्ती कीबात रखने का अवसर मिलेगा और ऐसा माहौल बनाने में मदद मिलेगी जिसमें दोनों देशों की सरकारों को वाजिबआवाजों को पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया जाए.

इस शांति कारवाँ के माध्यम से, हम लोगों से निम्नलिखत बिंदुओं पर सहयोग की अपेक्षा करते हैं:

. सरहद के आर-पार लोगों के आने-जाने को आसान बनाया जाए. वर्तमान में सरहद के आर-पार आने-जाने परअनेकों प्रकार के व्यवधान हैं - जिनमें से कुछ तो हास्यास्पद हैं. हम लोग चाहेंगे कि इन व्यब्धनों को हटाया जाएक्योंकि सरहद के आर पार लोगों के बीच प्रगाढ़ लगाव है. लोगों के बीच भावनात्मक जुडाव है - जो दोनों देशों कीसरकारों के बीच व्याप्त नफरत और शंका के ठीक विपरीत है! दोनों देशों की सरकारों को लोगों की इच्छाओं एवंअरमानों को अनसुना नहीं करना चाहिए, और लोगों को बिना रोकटोक के आने-जाने और मिलने-जुलने के लिएछूट मिलनी चाहिए. असल में तो वीसा-पासपोर्ट प्रणाली को हटाना चाहिए.

. आम लोगों की भावना का आदर करते हुए भारत-पाकिस्तान को बिना-शर्त दोस्ती कायम करनी चाहिए औरसभी मुद्दों को बात-चीत से सुलझाना चाहिए जिससे कि अमन का वातावरण कायम हो सके. भारत-पाकिस्तान केमध्य सारे संगीन मुद्दों को शांति वार्ता के जरिये ही सुलझाना चाहिए. इन मुद्दों में कश्मीर का मुद्दा भी शामिल है (जोहमारी राय में जम्मू एवं कश्मीर के लोगों को शामिल करके ही हल ढूँढा जा सकता है), और आतंक-सम्बंधितगतिविधियाँ भी जिसके शिकार दोनों देश के लोग होते रहे हैं.

. भारत एवं पाकिस्तान को अपने-अपने परमाणु कारखानों को जल्दी-से-जल्दी दुष्क्रियाशील करना चाहिए. दोनोंदेशों को बारूदी सुरंगों को नष्ट करना चाहिए और फौजों को वापस बराक में भेज देना चाहिए. हमारा मानना है किदोनों देशों को अपने बहुमूल्य संसाधनों को रक्षा-बजट के नाम पर व्यर्थ गंवाना बंद करना चाहिए और इनसंसाधनों से गरीबी हटाने में व्यय करना चाहिए. जो लोग इस शांति कारवाँ का हिस्सा हैं उनका मानना है कि सच्चीसुरक्षा हथियारों के ढेर इकठ्ठे करने से नहीं आती बल्कि सच्ची सुरक्षा आपसी विश्वास और भरोसे पर स्थापितसंबंधों से ही आती है. हकीकत यह है कि परमाणु बम एवं बारूदी सुरंगों से 'दुश्मन' को छति पहुचने की बजायअपने ही लोगों को कहीं अधिक नुक्सान पहुँच रहा है, इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा की ये हथियारजन-विरोधी हैं.

. दोनों देशों के बीच लुक-छुप वाला और लघु-तीव्र युद्ध समाप्त हो और दोनों देशों की गुप्तचर संस्थाएं पर रोक लगेकि सरहद के पार अशांति उत्पन्न हो.

शांति और विकास सिर्फ विश्वास और आपसी सद्भावना वाले वातावरण में ही संभव है - इस शांति कारवाँ का यहस्पष्ट सन्देश है. हम भलीभांति जानते हैं कि हमारे लक्ष्य सिर्फ इस प्रयास से नहीं हासिल हो सकते. हम यह भीमानते हैं कि दोनों देशों के लोगों द्वारा किये जा रहे अनेकों शांति प्रयासों में यह शांति कारवाँ एक है. आइये हम सबएकजुट हो कर इस शांति प्रक्रिया को निरंतर बढ़ाते रहे जिससे कि केवल भारत-पाकिस्तान के मध्य बल्किसंपूर्ण दक्षिण एशिया में भी आपसी विश्वास, सद्भावना और शांति का वातावरण बना रहे.
डॉ संदीप पाण्डेय
(समन्वयक: जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय)

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

लोगो के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करता आई० आर० सी० टी० सी०

IRCTC के पास नहीं है कोई जबाब, पूड़ी सब्जी कब होती है खराब

सूचना अधिकार अभियान कानपूर के साथी आर० के० तिवारी ने आर० टी आई० के तहत जब इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिजम कारपोरेशन से ये सवाल पूछा की पूड़ी सब्जी के बंद डिब्बे पर आई० आर० सी० टी० सी० लिखा रहता है तो कारपोरेशन निर्माता है या विक्रेता तो कारपोरेशन बगले झांकते नजर आ रहा है। कारपोरेशन के नियमानुसार पूड़ी सब्जी बनने के २ घंटे के अन्दर खाने के लिए बेहतर होती है। क्या डब्बे पर उत्पादन का समय और डेट लिखा जाता है। नियमनुसार क्या हर २ घंटे पर ताजा भोजन उपलब्ध कराया जाता है. क्या यह सुनिश्चित किया जाता है की वेंडर के पास एक दिन पहले बनी पूड़ी नहीं रखी है। क्या हर स्टेसन और रेलगाड़ी पर ख़राब हुए भोजन को नष्ट करने का कोई रिकार्ड रखा जाता है। क्या बंद डिब्बे की पूड़ी सब्जी खराब होने पर किसी अधिकारी के यंहा शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था है। सूचना अधिकार के तहत पूछे गए इन सारे सवालो के प्रतिउत्तर में आई० आर० सी० टी सी० के जन सूचना अधिकारी ने लिखा है की इस सन्दर्भ में उनके पास कोई सूचना नहीं है।लाखो लोगो के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने के साथ साथ रेलवे विभाग सूचना अधिकार अधिनियम २००५ का उलंघन भी कर रहा है।




( साभार हिदुस्तान कानपूर)
महेश कुमार
सूचना अधिकार अभियान कानपूर