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शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

प्रभाष जोशी का यूँ चले जाना

प्रभाष जोशी का यूँ चले जाना

जनसंगठनों की क्षति और जन सरोकारी पत्रकारिता में निर्वात

वरिष्‍ट पत्रकार श्री प्रभाष जोशी का निधन न सिर्फ पत्रकारिता बल्कि देश के जनसंगठनों के लिए भी अपूरणीय क्षति है। ऊनके निधन से दोनों ही स्‍थानों पर निर्वात महसूस किया जा रहा है।

श्री जोशी देशभर के सामाजिक समूहों से न सिर्फ जुड़े रहे हैं बल्कि उन्‍होंने ने ऐसे समूहों ने सक्रिय भागीदारी भी की है। ऊन्‍होंने देश के किसानों, दलितों, आदिवासियों, अल्‍पसंख्‍यकों और वंचित वर्गों के मुद्दे न सिर्फ अपनी लेखनी के माध्‍यम से उठाये बल्कि वे उनसे करीब से जुड़े भी रहें हैं। ऐसे ही समूहों में नर्मदा बचाओ आंदोलन भी शामिल है।

बात 1994 के जाड़े की है। झाबुआ (मध्‍यप्रदेश) जिला प्रशासन ने सरदार सरोवर बाँध प्रभावित आदिवासियों को नीति अनुसार जमीन दिए बगैर उन्‍हें उनके गॉंवों से खदेड़ने हेतु दमनचक्र चलाया था। झाबुआ जिले के तत्‍कालीन कुख्‍यात कलेक्‍टर श्री राधेश्‍याम जुलानिया के नेतृत्‍व में जिला प्रशासन लोगों को उनकी इच्‍छा के विरुध्‍द गॉंव से हटने के लिए के लिए मजबूर कर रहा था। उन पर फर्जी मुकद्दमें दायर कर लोगों की हिम्‍मत तोड़ने का षड़यंत्र जारी था। स्‍थानीय मीडिया भी इस मामले को अपेक्षित कवरेज नहीं दे रहा था उन दिनों श्री जोशी डूब प्रभावित गॉंव आंजणवारा गॉंव तक पैदल चल कर गए तथा लोगों को हिम्‍मत दी। याद रहे आंजणवारा झाबुआ जिले के उन पहुँचविहीन गॉंवों में से एक है जहाँ आजादी के 60 वर्ष बाद भी आज तक विधानसभा अथवा लोकसभा चुनाव का प्रचार करने किसी भी राष्‍ट्रीय राजनैतिक दल का कोई कार्यकर्ता नहीं पहुँचा है। यह गॉंव सरदार सरोवर बॉंध की डूब से 1994 से ही प्रभावित है लेकिन यहॉं के बाशिंदे आज भी गॉंव में ही डटे रह कर विनाशकारी विकास नीति को चुनौती दे रहे हैं।

अप्रैल 2002 में जब सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने सरदार सरोवर बाँध प्रभावितों के समर्थन में लेखन के लिए बुकर पुरस्‍कार से सम्‍मानित सुश्री अरुंधती रॉय पर न्‍यायालय की अवमानना हेतु सजा सुनाई। सजा पूरी कर जेल से छूटने पर गॉंधी शांति प्रतिष्‍ठान (नई दिल्‍ली) में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में उन्‍होंने दबंगता से कहा था - "यदि बॉंध प्रभावितों के अधिकारों की बात करना सर्वोच्‍च न्‍यायालय का अपमान है तो यह अपमान मैं बार-बार करुँगा। सुप्रीम कोर्ट चाहे तो मुझे भी जेल में डाल दें।"

जून 2002 में मध्‍यप्रदेश के धार जिले में स्थित मान परियोजना प्रभावित आदिवासी परिवारों को जब सरकार द्वारा पुनर्वास लाभ दिए बगैर उजाड़ दिया गया तो आंदोलन ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। प्रभावितों को जून की तन झुलसाती तपन के बीच राजधानी भोपाल में 35 दिनों तक धरना एवं 29 दिनों तक अनशन को बाध्‍य होना पड़ा। इस दौरान राजनैतिक-प्रशासनिक असंवेदनशीलता के कारण लोगों की पीड़ा को नजरअंदाज कर प्रभावितों को उनके अधिकारों से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा था, तब श्री जोशी ने आदिवासियों को उनके हक दिलवाने हेतु काफी काफी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। सरकार के साथ मध्‍यस्‍थता भी की। अनशन समाप्ति के बाद जुलाई 2002 में वे पूर्व अनुसूचित जाति-जनजाति आयुक्त श्री बी डी शर्मा के साथ परियोजना प्रभावित क्षेत्र जीराबाद (धार) में एक सप्‍ताह से अधिक तक रहे तथा परियोजना प्रभावितों को लाभ दिलवाने हेतु उनकी पात्रता निर्धारण में सहयोग दिया। उनके प्रयास से अनेक प्रभावितों को पुनर्वास लाभ मिलना सुनिश्चित हुआ।

श्री जोशी सच्‍चे अर्थों में देश के जनसंगठनों के सच्‍चे मित्र थे। यह उनके व्यक्तित्व की खासियत रही कि न तो वे कभी सत्ता के चाटुकार बने और न ही उन्‍होंने अपनी लेखनी को भी कभी सत्ता के गलियारों की चेरी नहीं बनने दिया। उनका निधन न सिर्फ जनसरोकारी पत्रकारिता के लिए क्षति है बल्कि देश के जनसंगठन भी अपने एक सच्‍चे दोस्‍त की कमी को हमेशा महसूस करते रहेंगें।

रेहमत
नर्मदा बचाओ आन्दोलन के सभी साथियों के तरफ से ...

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

झोपड़ पट्टी में रहने वालों का भी हैं अपना अधिकार

शिक्षा, आवास मौलिक अधिकार पर झोपड़ पट्टी में रहने वालों का भी अपना अधिकार

बड़े-बड़े लोगों की अपनी बातें, अपने काम, अपना अधिकार, अपनी दादागिरी सबकुछ अपना मानते हैं लेकिन, उन्हेंनहीं मालूम होगा या वे अंजान बनने की कोशिश कर रहे हैं कि यदि ये गरीब, मजदूर लोग जो आज झुग्गी-झोपड़ी मेंबसर कर रहे हैं बिना किसी लालच और बिना किसी दूसरे को नुकसान पहुंचाए बस चिंता है तो दो वक्त के पेट्रोलभोजन) की जिसके बिना ये शारीरिक इंजन नहीं चल सकता है | बस सिर पर एक छत की और जीवन चलाने केलिए रोजगार की और उन अधिकारों की जिन्हें सबसे पहले इन भारत निर्माण करने वाले बजाय अमीर, धनाढ्य, नेताओं, सरकारी तंत्र, बहुमंजिले आवास वालों को उनकी गन्दगी साफ़ करने तक इन झोपड़ी वालों की अहम्भूमिका होती है | जिस दिन ये लोग अपना काम करना बंद कर देंगे उसी दिन शहर वाले (राजनेता, नौकर-शाही ) सब के सब मर जायेंगे | तो भला अब बताइए कि सबसे पहले किसके अधिकारों की बात होनी चाहिए ?

इन सब अधिकारों को लेकर ये लड़ाईयां लड़ी जा रही हैं | इनमें है- लखनऊ शहर में बसी झोपड़- पट्टी डालीगंज, इस्माईल गंज आदि | झोपड़-पट्टी डालीगंज में करीब २५० परिवार झुग्गी-झोपड़ी बनाकर किसी तरह अपनाजीवन यापन करते हैं | ये वो लोग हैं जो शिल्पकारी (पत्थर का काटने), रिक्शा चालक, सब्जी का ठेला, मजदूरीकरते हैं | ये लोग करीब पिछले 25 सालों से गोमती नदी के किनारे प्लास्टिक की शीट डाल कर अपनी जीविकाचलाते चले रहे हैं | यहाँ पर "आशा ट्रस्ट " की तरफ से इनके बच्चों के लिए एक शिक्षा केंद्र चलता था | लोगअपनी जिंदगी बिना किसी सरकारी मदद के गुजार रहे हैं | बसपा सरकार, जो दलित की सरकार मानी जाती है, कीमुखिया के जन्म दिन पर इन झोपड़-पट्टी में रहने वालों को तोहफ़ा मिला बुलडोजर...........!

बुलडोज़र ने पहला काम किया सुबह बजे, लोगों के झोपड़े तोड़ने का, लोगों के झोपड़े में रखा पका-पकाया भोजन, बर्तन, घरेलू सामान को रौंदते हुए टीन सेडों और घास फूस और प्लास्टिक के तिरपाल को फाड़ते हुए आगे बढ रहा थातो दूसरी तरफ बहन जी ५२ किलो का केक काट रहीं थीं | बुलडोज़र की दहशत में झोपड़-पट्टी की गर्भवतीमहिला(दरुन्निशा पत्नी असगर अली ) प्रशव-पीडा से तड़प रही थी | प्रशासन मूक बना देखता रहा जबकि प्रशासनके आला-अफसर वहां मौजूद थे किसी ने इस महिला को हॉस्पिटल तक ले जाने की जहमत नहीं उठाई | अंततः मेरेद्वारा इस महिला को एक ठेलिया से सरकारी हॉस्पिटल पहुँचाया गया | जहाँ पर उसने समय से पूर्व दो जुड़वाँ बच्चोंको जन्म देने में रही खून की समस्या को मैंने अपना रक्त दान करके पूरा किया | एक माह की गर्भवती महिलामंतशा पत्नी राजू) जिसने बुलडोज़र की दहशत में समय से पूर्व मृत बच्चे को जन्म दिया |

बिना किसी सरकारी आवास की वैकल्पिक व्यवस्था किये इन लोगों को खुले मैदान में छोड़ दिया गया | सरकार ही सरकारी आदमियों को इसकी कोई परवाह थी | जिसका सहारा था उसी के राज्य की राजधानी लखनऊ में इन्हेंउजाडा गया अब ये जाएँ तो कहाँ जाएँ ? ऊपर से आरोप बंगलादेशी | क्योंकि मज़हब के लिहाज़ से मुसलमान, गरीबहोना, झोपड़ -पट्टी में रहना, बंगलादेशी घुसपैठिया होनी की पहली पहचान है | सीधे बंगलादेशी घोषित करकेइनके अधिकारों से वंचित करना सरकार की सोची-समझी साजिस है |

अब ये लोग बिना किसी सरकार या सरकारी परमीसन के शहरी गरीब आवास योजना के तहत बने आवासों में, जोशहर के बड़े-बड़े या फिर ठेकेदारों के नाम कर दिए गए हैं जिसमें किसी गरीब को मकान नहीं मिला है, कब्जा करकेअपने अधिकारों (स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, भोजन, पहचान पत्र) की लडाई लड़ रहे हैं | हम इनके अधिकारों कीलडाई में शामिल होकर इसका नेतृत्व कर रहे हैं | सरकार की जितनी योजनायें हैं उनका लाभ इन तक घसीट करलाने दिलाने की कोशिश कर रहा हूँ | अब इनके बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिले मिलने लगे हैं और राशन कार्डभी बनने लगे हैं | ये तो महज थोड़ी जीत की शुरुआत है | जबतक ये अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो जातेतथा इनका अधिकार नहीं मिल जाता, हमारी लड़ाई जारी रहेगी |



चुन्नीलाल
chunnilallko@gmail.com